कौशांबी विस्फोट के बाद उठे बड़े सवाल: 11 मौतों के बाद भी अधूरा इंसाफ, क्या सिर्फ लाइन हाजिरी से तय होगी पुलिस की जिम्मेदारी!!

समर्पण न्यूज
By - Samarpan News
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वर्षों से चल रही थी बारूद की फैक्ट्री तो सोती रही निगरानी व्यवस्था? हादसे में 11 की मौत के बाद पुलिस की भूमिका की भी हो निष्पक्ष जांच!!

कौशांबी: महमूदपुर मनौरी में पटाखा फैक्ट्री में हुआ भीषण विस्फोट महज एक हादसा नहीं, बल्कि निगरानी और जिम्मेदारी की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाली घटना है। विस्फोट में 11 लोगों की मौत, कई लोगों के घायल होने और आसपास के मकानों के मलबे में तब्दील होने के बाद अब सवाल केवल फैक्ट्री संचालक की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं रह गया है। यह भी जांच का विषय है कि यदि फैक्ट्री लंबे समय से संचालित हो रही थी तो स्थानीय स्तर पर पुलिस और संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था को इसकी भनक क्यों नहीं लगी। घटना के बाद पुलिस ने थाना प्रभारी, चौकी प्रभारी और पूर्व चौकी प्रभारी को लाइन हाजिर किया है, जबकि दो बीट आरक्षियों को निलंबित किया गया है। पुलिस की कार्रवाई में पदीय दायित्वों के निर्वहन में लापरवाही और उदासीनता का उल्लेख किया गया है। विभागीय कार्रवाई को प्रारंभिक कदम माना जा सकता है, लेकिन 11 लोगों की जान जाने के बाद इससे कई बड़े सवालों का जवाब मिलना अभी बाकी है। सबसे अहम प्रश्न यह है कि जब संबंधित पुलिसकर्मियों की लापरवाही सामने आने की बात पुलिस की कार्रवाई में ही स्वीकार की गई है, तो क्या केवल लाइन हाजिरी और निलंबन ही पर्याप्त है? विभागीय कार्रवाई अपनी जगह है, लेकिन आपराधिक जिम्मेदारी अलग विषय है। यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी पुलिसकर्मी को अवैध फैक्ट्री के संचालन की जानकारी थी और इसके बावजूद कार्रवाई नहीं की गई, सूचना दबाई गई अथवा किसी प्रकार का संरक्षण दिया गया, तो ऐसी स्थिति में आपराधिक जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। जांच में यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि फैक्ट्री कितने समय से संचालित थी। स्थानीय पुलिस को इसकी जानकारी कब हुई? किसी अधिकारी या कर्मचारी को इसकी सूचना मिली थी या नहीं? यदि सूचना मिली थी तो कार्रवाई क्यों नहीं की गई? इन सवालों के जवाब के लिए बीट बुक, जनरल डायरी, शिकायत रजिस्टर, गश्त संबंधी अभिलेख और स्थानीय स्तर पर प्राप्त सूचनाओं की पड़ताल की जानी चाहिए। इससे यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि क्षेत्र में पुलिस की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी थी। स्थानीय स्तर पर कथित रूप से ‘महीनवारी’ लेने और त्योहारों पर पटाखे वसूलने जैसी चर्चाएं भी सामने आने की बात कही जा रही है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इन्हें तथ्य मानना उचित नहीं होगा। हालांकि 11 लोगों की मौत के बाद यदि ऐसे आरोप सामने आ रहे हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच जरूर होनी चाहिए। यदि जांच में किसी प्रकार के लेनदेन, फोन संपर्क या संरक्षण के प्रमाण मिलते हैं तो संबंधित लोगों की भूमिका भी कानून के दायरे में तय की जानी चाहिए। फैक्ट्री संचालक और उसके परिवार के सदस्यों की घटना के समय मौजूदगी भी जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है। संचालक के मोबाइल की सीडीआर, लोकेशन और घटना से पहले तथा बाद के संपर्कों की जांच से घटनाक्रम की कड़ियां जोड़ी जा सकती हैं। साथ ही यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि विस्फोट से पहले फैक्ट्री में क्या गतिविधियां चल रही थीं और घटना के समय वहां कौन-कौन मौजूद था। अब जांच का दायरा केवल फैक्ट्री संचालक तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। यह पता लगाना होगा कि अवैध रूप से बारूद और पटाखों का कारोबार किस तरह संचालित हो रहा था और उसे रोकने की जिम्मेदारी निभाने वाला तंत्र आखिर कहां था। यदि किसी स्तर पर लापरवाही, मिलीभगत या संरक्षण सामने आता है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। 11 मौतों के बाद लाइन हाजिरी और निलंबन को कार्रवाई की शुरुआत माना जा सकता है, अंतिम निष्कर्ष नहीं। निष्पक्ष जांच से ही यह तय हो सकेगा कि किसकी कितनी जिम्मेदारी थी। यदि आपराधिक लापरवाही, सूचना छिपाने या संरक्षण के आरोप प्रमाणित होते हैं तो संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ अभियोग पंजीकृत कर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। अब सवाल सीधा है—क्या पुलिस अपने ही उन कर्मचारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कराएगी, जिनकी लापरवाही को कार्रवाई के माध्यम से स्वीकार किया गया है? या फिर 11 लोगों की मौत की जिम्मेदारी कुछ दिनों की लाइन हाजिरी और निलंबन के साथ ही खत्म मान ली जाएगी? इस सवाल का जवाब केवल पुलिस विभाग को नहीं, बल्कि उन परिवारों को भी चाहिए जिन्होंने इस भीषण विस्फोट में अपने अपनों को खोया है।

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