उत्तर प्रदेश में अक्टूबर में होगा 'गो-टेक 2026', गो-संरक्षण, प्राकृतिक कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा नया मंच

समर्पण न्यूज इंडिया
By - Samarpan News
0


समर्पण न्यूज लखनऊ, 

उत्तर प्रदेश में गो-संरक्षण, प्राकृतिक कृषि, स्वच्छ ऊर्जा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने के उद्देश्य से राज्य स्तर पर 'गो-टेक 2026' के आयोजन की तैयारी शुरू कर दी गई है। प्रस्तावित चार दिवसीय यह आयोजन अक्टूबर 2026 में आयोजित किया जाएगा। इसका उद्देश्य आधुनिक विज्ञान, तकनीकी नवाचार और पारंपरिक गो-आधारित व्यवस्थाओं को एक साझा मंच पर लाकर ऐसा मॉडल विकसित करना है, जिससे गौशालाएं आत्मनिर्भर बनें, किसानों की आय में वृद्धि हो और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार एवं उद्यमिता के नए अवसर पैदा हों।
इसी उद्देश्य को लेकर गुरुवार को लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग के सभागार में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने की। बैठक में गो-आधारित ग्रामीण विकास, प्राकृतिक कृषि और जैविक अर्थव्यवस्था से जुड़े कई विशेषज्ञों, अधिकारियों और विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस दौरान आयोजन की रूपरेखा, संभावित स्थान, उद्देश्य तथा भविष्य की कार्ययोजना पर विस्तार से चर्चा की गई।

बैठक में शामिल विशेषज्ञों ने इस बात पर सहमति जताई कि 'गो-टेक 2026' केवल एक प्रदर्शनी या सम्मेलन नहीं होगा, बल्कि यह देशभर में गो-आधारित नवाचारों, सफल प्रयोगों और आधुनिक तकनीकों को साझा करने वाला एक व्यापक ज्ञान मंच बनेगा। इसमें गौशाला संचालकों, किसानों, वैज्ञानिकों, कृषि विशेषज्ञों, शोध संस्थानों, स्टार्टअप कंपनियों, तकनीकी विशेषज्ञों और उद्यमियों को एक साथ जोड़कर ऐसे व्यावहारिक मॉडल तैयार किए जाएंगे जिन्हें प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में लागू किया जा सके।
बैठक में यह भी विचार रखा गया कि उत्तर प्रदेश में आयोजित होने वाला यह आयोजन देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है। इससे पहले इस प्रकार के कार्यक्रम अहमदाबाद, पुणे और जयपुर में आयोजित किए जा चुके हैं। अब उत्तर प्रदेश में इसे और अधिक व्यापक स्वरूप देने की योजना बनाई जा रही है। आयोजन के लिए गोरखपुर, झांसी, वृंदावन, अयोध्या और लखनऊ जैसे शहरों पर विचार किया जा रहा है। अंतिम निर्णय सभी आवश्यक व्यवस्थाओं और सुविधाओं का आकलन करने के बाद लिया जाएगा।

चर्चा के दौरान सबसे अधिक जोर इस बात पर दिया गया कि गौशालाओं को केवल गोवंश संरक्षण तक सीमित न रखकर उन्हें ग्रामीण अर्थव्यवस्था के मजबूत केंद्र के रूप में विकसित किया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गोबर और गोमूत्र का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग किया जाए तो इससे बायोगैस, जैविक खाद, प्राकृतिक कृषि के लिए आवश्यक इनपुट और अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इससे गौशालाओं की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और वे आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगी।
बैठक में ग्रामीण क्षेत्रों में रूरल सर्कुलर बायोइकोनॉमी की अवधारणा को भी विस्तार से रखा गया। इसके अंतर्गत स्थानीय संसाधनों का वैज्ञानिक और सतत उपयोग करते हुए एक ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर बल दिया गया जिसमें अपशिष्ट का पुनर्चक्रण हो, ऊर्जा का उत्पादन बढ़े, मृदा की गुणवत्ता सुधरे और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिले। विशेषज्ञों ने कहा कि गोबर से स्वच्छ ऊर्जा तथा जैविक खाद तैयार करने जैसी पहलें किसानों की लागत कम करने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में आय के अतिरिक्त स्रोत भी तैयार कर सकती हैं।

बैठक में प्रदेश में बायोगैस संयंत्रों के विस्तार पर भी चर्चा हुई। बताया गया कि उत्तर प्रदेश में विभिन्न संस्थाओं और कंपनियों के सहयोग से हजारों बायोगैस संयंत्र पहले से संचालित हैं। अब राज्य सरकार बड़े स्तर पर इनकी संख्या बढ़ाने की दिशा में कार्य कर रही है। यदि इन संयंत्रों को गौशालाओं और किसानों से प्रभावी ढंग से जोड़ा जाए तो ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ प्राकृतिक खेती और पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती मिलेगी।


आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि 'गो-टेक 2026' का मूल उद्देश्य गोसेवा को आधुनिक विज्ञान और तकनीकी नवाचार के साथ जोड़ना है। उन्होंने कहा कि समय की आवश्यकता है कि गोवंश संरक्षण को केवल सामाजिक या धार्मिक दृष्टि से न देखकर आर्थिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी विकसित किया जाए। यदि गोबर और गोमूत्र का वैज्ञानिक उपयोग बढ़ेगा तो इससे स्वच्छ ऊर्जा, जैविक खेती और ग्रामीण उद्योगों को नई गति मिलेगी। साथ ही युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर भी विकसित होंगे।

बैठक में मौजूद विशेषज्ञों ने भी इस विचार का समर्थन किया कि देशभर में गो-आधारित सफल प्रयोगों और तकनीकी समाधानों को एक मंच पर लाकर उनका आदान-प्रदान किया जाना चाहिए। इससे नई तकनीकों को तेजी से अपनाने में सहायता मिलेगी और किसानों को आधुनिक तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों का लाभ मिल सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने में गो-आधारित संसाधनों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
बैठक के दौरान यह भी कहा गया कि वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, मृदा क्षरण और पर्यावरण प्रदूषण जैसी चुनौतियां तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में गो-आधारित प्राकृतिक समाधानों को बढ़ावा देना भविष्य की आवश्यकता बन गया है। गोबर से तैयार जैविक खाद मृदा की उर्वरता बढ़ाने में सहायक होती है, जबकि बायोगैस स्वच्छ ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इसके अलावा गो-आधारित उत्पाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान दे सकते हैं।

विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि वैज्ञानिक शोध, तकनीकी नवाचार और उद्यमिता को गो-आधारित गतिविधियों से जोड़ने की आवश्यकता है। यदि विश्वविद्यालयों, कृषि संस्थानों, अनुसंधान केंद्रों और स्टार्टअप कंपनियों के सहयोग से नई तकनीकों का विकास किया जाए तो गो-आधारित उद्योगों को नई पहचान मिल सकती है। इससे ग्रामीण युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलेगा और पलायन जैसी समस्याओं में भी कमी आ सकती है।

बैठक में यह निष्कर्ष निकाला गया कि 'गो-टेक 2026' उत्तर प्रदेश के लिए केवल एक आयोजन नहीं बल्कि एक दीर्घकालिक विकास अभियान होगा। इसका उद्देश्य गो-संरक्षण को प्राकृतिक कृषि, स्वच्छ ऊर्जा, पर्यावरण संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य, ग्रामीण स्वावलंबन और उद्यमिता से जोड़ते हुए एक सशक्त ग्रामीण अर्थव्यवस्था का निर्माण करना है। यह पहल विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के अनुरूप उत्तर प्रदेश में एक टिकाऊ और आत्मनिर्भर रूरल सर्कुलर बायोइकोनॉमी मॉडल विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

आयोजन की तैयारियों को लेकर संबंधित विभागों और संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। आगामी दिनों में आयोजन स्थल का अंतिम चयन, प्रतिभागियों का पंजीकरण, तकनीकी सत्रों की रूपरेखा और विभिन्न प्रदर्शनी गतिविधियों का विस्तृत कार्यक्रम जारी किया जाएगा। उम्मीद की जा रही है कि इस आयोजन के माध्यम से उत्तर प्रदेश गो-आधारित नवाचार, प्राकृतिक कृषि और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में देश को एक नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

Post a Comment

0 Comments

Post a Comment (0)
3/related/default